रविवार, 14 जुलाई 2013

गाजर घास

झेलता आया हूँ कमबख्त,  पचास साल से...
नामुराद बची है तू,  अभी भी काल से?

उग जाती है तू जहाँ देखो,  बगैर ताल से
लुट गया मेरा बाल बाल तक,  तेरी देखभाल से

सोचा था बस तुझे, उखाड़ मारूँगा
पर हो गया बेजार, गलीज तेरी चाल से ..

काम और काज के सब्जबाग में फंसा
तडप तडप कर रह गया,  फटे ही हाल से.. .

देकर कटोरा हाथ में,  खुश हुई है तू?
रूक, ना बचेगी तू भी अब, इस भूचाल से...

सुन, और अब मैं झांसे में, तेरे आउंगा नहीं..
खिला दे दाने भले,  तू कितने अपनी डाल से..

तोड फेंक दूंगा तुझे, जड समेत हाँ..
उगेंगे अब गुलाब यहां,  तेरी खाल से.. .

बुधवार, 7 मार्च 2012

होली है

होली है? ....
जब हो ही ली है, तो फिर कैसी होली है?
रंग कई है चटख चमकते, 
जाने क्यों सब काले दिखते?
ठंडे पानी, खूब नहाया, 
फिर भी गहरे सो ली है.. 
होली है?.....
ऊँची आवाजों में, झूमें, 
नाचें, गायें..
बाहर भीतर शोर भरा, 
अंदर फैली नीरवता.. 
मौज मनाती, मतवाली ये,
कैसी टोली है..
होली है?.....
मीठा खट्टा भोग लगाकर, 
जीभ स्वाद से भरी हुई, 
गहरे गहरे कड़ुआहट है, 
कैसी ये हमजोली है?
होली है?....

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

फलसफ़ा ....

"जबसे आया हूँ जमीं पर, कसमसाहट है ...
कभी कुछ यहाँ होता है, कभी कुछ वहाँ होता है..
बोलता हूँ जब कुछ बोलना नहीं,
 जब चिल्लाना हुआ, तब मौन हूँ...
दुःख मिले, छोटे बड़े, रोता भी रहा,
किसी से बांटा, तो किसी से सहा
 रोते हुए भूल गया इस बात को,
 हजारों करोड़ों की भीड़ है, मैं तो बस गौण हूँ...
किसी ने कुछ कहा, किसी ने कुछ चाहा, 
सबके लिए, मैं खुद को ढालता गया..
पता पूछते पूछते, कट गयी उमर
 रहता कहाँ हूँ, मैं कौन हूँ....
रहता कहाँ हूँ, मैं कौन हूँ...."

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

करारा

कानों में झनझनाहट है,
उफ़ ये कैसी आहट है,
कहीं मेरे पुराने पाप तो नहीं?
पिद्दी से यें, मेरे बाप तो नहीं?
पता नहीं किधर जा रहे हैं?
साले हमसे टकरा रहे हैं
पंडित जी, राहू पर केतु तो नहीं चढ गया,
गुलाम घोडा, आज कैसे अड गया?
लग रहा है, दिन पूरे हो गए हैं,
बाबा लोग जाने कैसे बीज बो गए हैं?
मैंने तो बोरिया बिस्तर लपेट लिया है,
तुम भी समेट लो,
कल को मत कहना,
 शुक्र शनि सब साजिश कर रहे हैं,
और हम यहाँ बैठे कानों की मालिश कर रहे हैं......

लोकशाही

खेद है, 
रुकावट के लिए खेद है,
चूसने की प्रक्रिया में रुकावट के लिए खेद है...


पर तुम्हारे सन्नाटे में क्या भेद है .....
......
भागो, तुम आम हो हम नहीं डरते...
हमारा दुर्ग अभेद्य है...

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

माफ कर देना..

दोस्तों मुझे माफ कर देना,
मैं साधारण इंसान था, दूर तक नहीं देख सकता था,
इसलिए जितनी दूर तक मेरा दिमाग जा सका मैंने बस उतना सोचा,
और बिना किसी कारण के सबके दिलों को खरोंचा,
सब कुछ अचानक हो गया, जीवन सीधे चलते चलते किसी जंगल में खो गया,
जंगल में अनजाने भय के शेर और चीतों ने मुझे दबोच लिया,
मैं अंधा,..... गुलाब को काँटा सोच लिया......
गुलाब को मेरी बेहयाई से पीड़ा पहुंची होगी....
ए दोस्तों गुलाब को बता देना,
मैं फूटी किस्मत वाला था,
उसको खुशबू और कोमलता का कद्रदान मिल जायेगा,
उसको समझा लेना,
ईश्वर के कोप का अधिकारी मै,
मुश्किल है मेरी पतवार खेना,
ऐ दोस्तों मुझे माफ कर देना....

सोमवार, 2 अगस्त 2010

अनजाना डर

छिन्न भिन्न हो बंट जाऊंगा
मुझे पता था ? मर जाऊंगा?
मेरी इसमें गलती क्या है,
सपने तुमने देखे थे.
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सावन की हरियाली होगी
आँगन में फुलवारी होगी
बच्चों की किलकारी होगी
अच्छा होता ऐसा होता
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फुलवारी में कांटें होंगे
मुझे पता था? छिल जाऊंगा?
मेरी इसमें गलती क्या है,
सपने तुमने देखे थे.
*********************
लोक लाज का पालन होगा
गृहस्थी का संचालन होगा
पित्र ऋण का तारण होगा
अच्छा होता ऐसा होता
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गृहस्थी में हंगामा होगा
मुझे पता था? हिल जाऊंगा?
मेरी इसमें गलती क्या है,
सपने तुमने देखे थे.
*********************
जीवन में सपनें होंगे
वो सारे अपने होंगे
उनमें मन रमने होंगे
अच्छा होता ऐसा होता
-------------------------------
सपनों में इतिहास दिखेगा,
मुझे पता था? डर जाऊंगा?
मेरी इसमें गलती क्या है,
सपने तुमने देखे थे.
*********************

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

दो पैरोडी .... No prizes for guessing..

......{१}................................
ऊपर पैसा जाता है,
नीचे बाबू खाता है..
बाबू के नीचे अर्दली,
उसने भी रिश्वत मांग ली
बिन पैसे दफ्तर जाना नहीं..
काम तुम्हारा होना नहीं..
........{२}..................................
बाबू अफसर सब हुशियार
मिल जुल चलता कारोबार
Below above सबने है खाई
डेमोक्रेसी में करो कमाई...
.......................................................

सोमवार, 25 जनवरी 2010

मरने से पहले

मरने से पहले, कुछ ऐसा, कर जा,
के तेरी कब्र पर, जिंदगी के, मेले लगा करें.....

ये कैसी आज़ादी

चले गए अंग्रेज,            और देश हुआ आज़ाद,
तुम कहते थे,   मिल जायेगा,   हम सबको स्वराज...
तुमने हमसे,   किया था वादा,       सबको खाना देंगे,
सारी दुनिया से लड़कर भी,    अपना हक ले लेंगे..
कोई न ऊँचा कोई न नीचा,      कोई भेद न होगा,
प्रगति के फलफूल का वितरण,    एक एक को होगा...
बीत गए साल दर साल,    हम आज भी वहीँ खड़े हैं,
बोलो तुम ही खेवनहार!,      हम क्यूँ अब भी पिछड़े हैं..
बोलो क्यूँ ,    आज भी बुन्दू,  सर पर मैला ढोता है,
बोलो क्यूँ,   आज भी हरिया,   फुटपाथ पे सोता है...
क्यूँ  छोटू,    चाय के कप में,    हरदम   खटता रहता है,
क्यूँ आज भी ,   देश का गेंहूँ,    गोदामों  में सड़ता  है....
क्यूँ १०० में से ८० हिस्सा,  बीच में ही    खो    जाता है,
कैसे पाँच साल में  ,  जनसेवक,    करोड़पति हो जाता है..
खिलाफत में उठने वाली,    क्यूँ       आवाज,      दबा दी जाती है,
खाली पेट , सड़क पर लेट,      ये कैसी आज़ादी  है..???
छोटे छोटे देश कूद कर ,      आज कहाँ से कहाँ गए....
हम क्यूँ वहीँ धंसे  रह  गए ,   कुछ बोलो खेवनहार....
सावधान ओ देश के नेता!    जनता मांग रही जवाब...
कैसे खर्च         करदी     आजादी...
अब इसका करो  हिसाब ...   
अब इसका करो हिसाब....